रायपुर, 12 अक्टूबर 2026। भारत के इस्पात उद्योग में तेजी से हो रहे विस्तार और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच मध्य भारत के इस्पात उत्पादकों के लिए सहयोगात्मक मॉडल अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। रायपुर में आयोजित एमजे स्टीलथॉन सम्मेलन में उद्योग जगत के विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि छत्तीसगढ़ तथा आसपास के क्षेत्रों में संचालित मध्यम और छोटे इस्पात उत्पादकों को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने और विकास के अवसरों का लाभ उठाने के लिए आपसी सहयोग का रास्ता अपनाना होगा।
‘व्यवसायों को जोड़ना, अवसरों का सृजन करना’ विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में जिंदल स्टील लिमिटेड के प्रबंध निदेशक वी.आर. शर्मा ने कहा कि मध्य भारत के अधिकांश इस्पात संयंत्र आकार में अपेक्षाकृत छोटे हैं, जबकि बड़े एकीकृत इस्पात उत्पादक लगातार अपनी क्षमता का विस्तार कर रहे हैं। इसके साथ ही पर्यावरणीय मानकों और नियामक चुनौतियों में भी वृद्धि हो रही है। ऐसे परिदृश्य में छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए सहकारी मॉडल एक प्रभावी समाधान साबित हो सकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि उद्योग इकाइयां मिलकर विशेष प्रयोजन संस्थाओं (एसपीवी) का गठन करें और साझा आधारभूत सुविधाओं का विकास करें। उदाहरण के तौर पर एक साझा डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (डीआरआई) यूनिट स्थापित की जा सकती है, जिससे लागत में कमी आएगी और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।
सम्मेलन में ग्रांट थॉर्नटन भारत के मेटल्स एंड माइनिंग इंडस्ट्री लीडर एवं पार्टनर नीलाद्रि भट्टाचार्जी ने कहा कि मध्य भारतीय इस्पात उत्पादकों को केवल लॉन्ग स्टील उत्पादों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने उद्योग को नए और उच्च संभावनाओं वाले क्षेत्रों में अवसर तलाशने की सलाह दी।
भट्टाचार्जी ने कहा कि विदर्भ और रायपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों के संगठनों को केंद्र सरकार के साथ मिलकर रक्षा उत्पादन, पूंजीगत वस्तुओं, ऑटोमोबाइल, वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि इन क्षेत्रों में मजबूत औद्योगिक आधार बनने से इस्पात उद्योग के लिए दीर्घकालिक मांग और विकास के नए अवसर पैदा होंगे।
इस अवसर पर एमजंक्शन सर्विसेज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनय वर्मा ने भारत के बदलते इस्पात परिदृश्य में छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देश की विकास यात्रा का अगला चरण इसी क्षेत्र में आकार ले रहा है और भारत वर्ष 2047 तक 600 मिलियन टन इस्पात उत्पादन क्षमता हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
विनय वर्मा ने विश्वास व्यक्त किया कि इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के इस्पात उद्योगों का योगदान निर्णायक होगा। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की औद्योगिक क्षमता, कच्चे माल की उपलब्धता और उद्यमशीलता की भावना इसे देश के इस्पात विकास का अहम केंद्र बना सकती है।
एमजे स्टीलथॉन सम्मेलन में व्यक्त विचारों से स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सहयोग, नवाचार और विविधीकरण के माध्यम से ही मध्य भारत का इस्पात उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी मजबूत पहचान कायम कर सकेगा।